डोमेस्टिक वायलेंस यानि कि घरेलु हिंसा
दोस्तों आज हम बात करने जा रहे हैं डोमेस्टिक वायलेंस मतलब कि घरेलु हिंसा के बारे में। हमारे देश में शुरू से ही महिलाएं घरेलु हिंसा का शिकार होते आई हैं। हालाँकि कभी-कभी पुरुषों के मामले में भी ऐसे केसेस दिखाई देते हैं लेकिन बहुत ही कम। आज हमारा देश भले ही काफी प्रगति कर लिया हो लेकिन महिलाओं की स्थिति आज भी बद से बदतर ही है।
कभी दहेज के लिए जला दिया जाता है तो कभी उन्हें बलात्कार का शिकार बनाया जाता है। इस तरह से उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है। सबसे शर्म की बात तो ये है कि बलात्कार के मामले में आज हमारे इतने प्रगतिशील देश में एक नवजात बच्ची को भी नहीं छोड़ा जाता है।
आज भी हमारे समाज में महिलाओं को कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाते हैं। बता दें, घरेलु हिंसा की समस्या सिर्फ हमारे देश की ही नहीं बल्कि यह दुनियाँ की लगभग हर देश की समस्या है।
क्या है घरेलु हिंसा
आज भी हमारे समाज में जब एक लड़की जन्म लेती है तभी से वह बोझ बन जाती है। पहले तो उसके माँ-बाप के घर में उसे उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। फिर जब उसकी शादी हो जाती है तो ससुराल वाले उसको प्रताड़ित करते हैं। चिंताजनक बात तो ये है कि हमारे समाज में ऐसे मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं।
घरेलु हिंसा के दायरे में आने वाली कुछ बातें:- – घर के अंदर महिला से मारपीट करना उसे गाली गलौज देना
– जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाना या फिर बनाने की कोशिश करना
– महिला को डराना, धमकाना, उनके खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना
– दहेज के लिए प्रताड़ित करना
– जबरन शादी के लिए बाध्य करना या फिर किसी भी काम के लिए उन पर दवाब डालना भी घरेलु हिंसा की श्रेणी में आता है।
ऐसे हिंसा के कई रूप होते हैं जैसे घर के अंदर हिंसा, सावर्जनिक स्थान पर हिंसा तथा व्यावहारिक हिंसा इत्यादि। कुछ महिलाएं घर के चारदीवारी के अंदर ससुराल वाले या फिर पति के हिंसा की शिकार होती हैं तो वही कुछ महिलाएं जो कामकाजी होती हैं वो भी अपने दफ्तर के मर्द सहयोगियों द्वारा हिंसा की शिकार होती हैं। महिलाएं ये सब चुपचाप सहती हैं और अगर वो विरोध करती भी है तो उन्हें दबा दिया जाता है।
महिलाओं को घरेलु हिंसा से बचने के लिए सरकार ने कुछ कानून बनाये हैं जो हर महिला को जानना चाहिए।
घरेलु हिंसा एक्ट :-
घरेलु हिंसा एक्ट का निर्माण वर्ष 2005 में किया गया और 26 अक्टूबर 2006 को लागु किया गया। यह कानून महिलाओं को घरेलु हिंसा से बचाता है। केवल हमारे देश में ही लगभग 70 फिसदी महिलाएं किसी न किसी रूप से इसका शिकार हैं। यह भारत में पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को अपने घर में रहने का अधिकार देता है।
– इस कानून के तहत कोई भी महिला यदि वह मारपीट, यौन शोषण, आर्थिक शोषण या अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल की परिस्थिति में करवाई कर सकती हैं।
– इस कानून के अनुसार महिला के साथ हुई घरेलु हिंसा का साक्ष्य प्रमाणित किया जाना जरूरी नहीं हैं। महिला के दवारा प्रस्तुत साक्ष्यों को ही आधार माना जायेगा क्योंकि अदालत का मानना हैं कि घर के अंदर हिंसा के साक्ष्य मिलना मुश्किल हैं।
– घरेलु हिंसा से पीड़ित कोई भी महिला अदालत में जज के समक्ष्य स्वयं या वकील सेवा प्रदान करने वाली संस्था या संरक्षण अधिकारी की मदद से अपनी सुरक्षा के लिए बचावकारी आदेश ले सकती है।
– पीड़ित महिला के अलावा कोई भी पड़ोसी, परिवार का सदस्य, संस्थाएं या फिर खुद महिला की सहमति से अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में शिकायत दर्ज कराकर बचावकारी आदेश हासिल कर सकती है।
– इस कानून का उल्लंघन होने की स्थिति में जेल के साथ-साथ जुर्माना भरना भी हो सकता है।
दो महीने में फैसला
आम धारणा है कि हमारे देश में मामला अदालत में जाने के बाद वर्षो तक लटका रहता है, लेकिन अब इस नए कानून में मामला निपटाने की समय सीमा तय कर दी गई है। अब ऐसे मामले का फैसला मजिस्ट्रेट को दो महीने मतलब की 60 दिनों के अंदर-अंदर करना होगा।
Writer at India Alive

